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  • कमाई

    तुम से प्रेम कमा लेता हूँ
    थोड़ी सी मेहनत लगती है
    पर पूरा सुख पा लेता हूँ
    क्या क्या जतन हुआ करते है
    आओ तुम्हे बता देता हूँ
    या रहने दो
    बोल के अक्सर
    चीज़ें बहुत गवा देता हूँ
    यूँ भी होता रहे तो काफी
    है मुझ को दिन ढल जाने तक
    ओस चाट के प्यास बुझाई
    हम ने तुझ से मिल पाने तक
    कितने बाजारों में भटके
    चाकर हुए , मिली न कौड़ी
    कितनो ने छोड़ा था बैरंग
    पर दिल ने उम्मीद न छोड़ी
    उम्मीद भी जब जाने लगती है
    तुम पर आस टिका देता हूँ
    तुम से प्रेम कमा लेता हूँ
    हाँ तुम से सुख पा लेता हूँ – धुर्जटा

  • ज़िक्र

    खुद से भी अब यार करते नहीं
    की हम ने कितनो से बातें तेरी
    किसी खाली कोने में जब मुस्कुराये
    उजला हुआ चाँद तो गीत गाए
    FB का status बस इक smiley था
    हर बात मेरी तेरा ज़िक्र ही था
    कभी खत्म तुझ से सरोकार होगा
    हमें न पता था की ये दौर होगा- धुर्जटा

  • धुआ

    आसमान में तैरता है भ्रम
    हुआ मुहजोर मौसम
    टपकती है ओस संशय की
    सतह से सोखता है मन
    बनाया था जो पुतला
    समझा जिसे स्वरुप
    बिगड़ जाता है
    मैं खुद को समझने की चाह में रोज़ लिखता हूँ
    ढालता हूँ खुद को किसी विचार में
    विचार
    जो लिए होते है उधार में
    उधार चुका दिए जाने के बाद बचता है धुए का बादल
    जिसे अपने कंकाल में संभाले
    फिर करता हूँ खुद को किसी विचार के हवाले
    फिर धुआ हो जाने तक
    टोह अपनी पाने तक- धुर्जटा

  • TuliPhilosphy

    A guilt-free B/W this time around! loved the light, loved the texture, loved the way these Tulips gave each other company! Good friends with their own spaces, partners with their own zones! Tulips could very well be a philosophy in addition to being such beautiful flowers!

    And a few more of these beauties below…

  • सोचता हूँ मैं मगर

    जोर से सोचूं अगर तो ढूँढ लूँगा हल कई
    जोर देने का मगज पर मूड ही बनता नहीं

    सोचता हूँ की ठहर जाऊं किसी इक बात पर
    रिस्क भी तो ले के देखूं जान रख कर ताक पर
    इक अदद ये ज़िन्दगी है कुछ तो इस के साथ हो
    इतनी बातें सोच ली है सच कोई इक बात हो
    छोड़ दूं क्या इस शहर को की नयी शुरुआत हो
    रिस्टार्ट कर डालूँ सभी कुछ बस मे जो ये बात हो

    झोंक डाला जायेगा सब अब जो चिंगारी जले
    फैसला हो जाये मंजिल का तो उस जानिब चलें
    चाह होती है नयी हर दिन जो होती है सहर
    बेचैनियों से वास्ता पड़ता है फिर हर इक पहर
    अब किसी के मशवरे का भी नहीं होता असर
    “कुछ न सोचो…कुछ न सोचो ”
    सोचता हूँ मैं मगर – धूर्जटा

  • शादी

    तुझ को दिल में रख कर
    सूरज के काटे चक्कर
    फेरे पड़ चुके है
    शादी हो गयी है
    अर्धांगिनी कहने में तुझ को
    कोई हर्ज़ नहीं है
    तेरी वजह से जान मेरी
    आधी हो गयी है – धुर्जटा

  • राह

    नशे में किया हुआ इक वादा
    होश के काँधे पर बैठा है
    बचपन में देखे थे सपने
    वो सब कितने बचकाने है
    हर दिन एक लकीर को काट मैं
    थोडा आगे बढ़ जाता हूँ
    नज़र जहाँ तक जाती है
    बस खड़ी लकीरें ही पता हूँ
    आते जाते तुम ने मुझ को
    यहाँ से अकसर देखा होगा
    इस बार मैं ये कहने आया हूँ
    बहुत हुआ अब मैं जाता हूँ- धुर्जटा

  • समझ

    बोली तो समझ में आती है
    कुछ बातें समझ में आती नहीं

    मैं एक पतंग को जानता हूँ
    जिस का रिश्ता आकाश से है
    जो उड़ जाये तो उड़ जाये
    पर बंधी हुई किसी पाश से है
    बिजली के तारों में उलझी वो
    रह रह कर सर को उठाती है
    खींच के लम्बी सांस कभी
    आखिर क्यों उड़ जाती नहीं ?

    बोली तो समझ में आती है
    कुछ बातें समझ में आती नहीं

    मैं घिरा भीड़ से रहता हूँ
    जिस में काने है लोग सभी
    जो देखते है मुझ को आधा
    और आधे है मेरे दोस्त सभी
    मुझ से टकराकर रूकते है
    फिर अपनी राह को जाते है
    फोड़ के मेरी आँख कभी
    क्यों भीड़ मुझे अपनाती नहीं ?

    बोली तो समझ में आती है
    कुछ बातें समझ में आती नहीं – धुर्जटा

  • निद्रा

    अज्ञात की इक डोर मुझको कल्पना पकड़ा गयी थी
    उधेड़ता है और बुनता हूँ, बड़ा ही व्यस्त हूँ
    माजरा सारा समझ में आने ही वाला मुझे है
    नींद में ही चल रहा हूँ और सपने देखता हूँ – धुर्जटा